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कहानी: खेल फितरत के


सफ़िया की आँख खुली तो अभी हल्का अँधेरा ही था, लेकिन वह घबराकर बिस्तर छोड़ उठी। कल से अब्बा यहीं थे और उनके आ जाने से घर में एक अजीब-सा तनाव पैदा हो गया था। उसके पति आमिर डबल बेड पर बेख़बर सो रहे थे। वह बरामदे में रखे वॉशबेसिन के पास गई, ब्रश किया और हाथ-मुँह धोए।

दूसरे कमरे में झाँका तो अब्बा भी अभी सो ही रहे थे। अब्बा को अब ख़ुद पर बिल्कुल नियंत्रण नहीं रहा था। कल दिन भर में उन्होंने दो बार पायजामा गीला कर दिया था, जिसे जैसे-तैसे बदलवाना पड़ा था। रात में भी एक बार पुकारने पर वह दौड़कर उन्हें सहारा देकर बाथरूम तक ले गई थी, लेकिन फिर भी पायजामा गीला हो गया और उसे दोबारा बदलना पड़ा।

आए हुए अभी एक ही दिन हुआ था, लेकिन इस हालत में आगे उन्हें सँभालना कितना मुश्किल होगा, वह सोच भी नहीं पा रही थी।

टिफ़िन तैयार करके उसने बच्चों को जगाया। उनके स्कूल जाने के बाद फिर चिंता ने उसे घेर लिया। अब्बा के मिज़ाज को तो उसने बचपन से देखा था, लेकिन अब न जाने उनकी ज़ुबान में कितनी ताक़त आ गई थी कि चिल्ला-चिल्लाकर गालियाँ देते हुए भी थकते नहीं थे। गालियाँ भी ऐसी कि बच्चों और उसके शौहर के सामने सुनी नहीं जा सकती थीं।

देखने में उनकी हालत का कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता था, लेकिन एक ही दिन में वह वास्तविकता देख चुकी थी। उनके ग़ुस्से और गालियों के साथ कपड़े और बिस्तर ख़राब कर लेने जैसी शारीरिक दुर्बलताओं को सँभालना भी बहुत कठिन था।

उसकी अपनी ज़िम्मेदारियाँ भी कम नहीं थीं। सरकारी नौकरी में तबादले कभी भी हो जाते थे। इस बार तो बीच सत्र में, दो महीने पहले ही, बच्चों का यहाँ के स्कूल में दाख़िला कराना पड़ा था। कुछ मेहनत तो लगी, लेकिन शुक्र था कि बच्चे नए स्कूल में पढ़ाई में ठीक हो गए थे।

सरकारी कॉलोनी के इस क्वार्टर से अम्मा और अब्बा पंद्रह-बीस किलोमीटर दूर दूसरे मोहल्ले में रहते थे। अम्मा अब रिटायर हो चुकी थीं। अब्बा तो शुरू से ही ज़्यादातर वक़्त घर पर रहते थे। वे और दादी हमेशा कहते थे कि अम्मा को अपनी नौकरी हम सबसे ज़्यादा प्यारी थी। वे यह भी बताते थे कि अम्मा के पास दोनों बहनों के लिए कभी समय नहीं था और वे दोनों ही थीं जिनके पास वे दोनों बहनें पलकर बड़ी हुई थीं।

जब अम्मा दिन भर उन्हें नहीं मिलती थीं, तब बचपन में उन्हें भी यही लगता था।

दादी को गुज़रे कई साल हो चुके थे। बड़ी बहन की शादी दूसरे शहर में हुई थी और वह वहीं रहती थी। लेकिन वर्तमान स्थिति में उसे परेशान करने से भी क्या होता?

कल अब्बा के पीछे-पीछे अम्मा भी अब्बा का सामान लेकर यहाँ आई थीं। तब उन्होंने बताया था कि अब्बा कुछ ऐसी चीज़ें खाना चाहते थे जो उनके लिए नुक़सानदेह थीं। अम्मा ने मँगाकर उन्हें नहीं दीं, जिस पर अब्बा ने घर में ही नहीं, सड़क पर निकलकर भी अम्मा को गालियाँ दीं और शोर मचाया कि वह उन्हें भूखा मार देना चाहती हैं।

आख़िर में उन्होंने चिल्लाकर कहा था, "मैं अपनी बेटी के पास जाकर रहूँगा। दो रोटी तो वो भी दे देगी।"

और यह कहकर ऑटो करके अब्बा यहाँ चले आए थे।

वैसे इस तरह के हंगामे वह बचपन से देखती आई थी।

अम्मा ने उन्हें वापस ले जाने की काफ़ी कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने। बल्कि अम्मा को देखते ही और भड़क गए और लगातार गन्दी गालियाँ देते रहे। अम्मा की शर्मिंदगी की कोई हद न थी।

जब अब्बा का ग़ुस्सा और गालियाँ किसी तरह नियंत्रित नहीं हुए, तब आमिर ने अब्बा का कुछ दिन यहाँ रुकना और अम्मा को वापस भेज देना बेहतर समझा। सफ़िया को भी मजबूरी में उनकी हाँ में हाँ मिलानी पड़ी।

आख़िर अम्मा उनकी दवाइयाँ और दवाइयों का समय सफ़िया को समझाकर वापस लौट गईं।

एक तो अब्बा की यह ज़ुबान, फिर कपड़ों में गन्दगी हो जाने पर उनकी सफ़ाई—सब मिलाकर स्थिति बहुत मुश्किल होने वाली थी। आमिर और बच्चों की साफ़-सफ़ाई की आदत को वह अच्छी तरह जानती थी।

सफ़िया करे तो क्या करे?

सबसे बड़ा डर तो उसे आमिर का ही था।


नईमा बेटी के पास नासिर को छोड़ तो आई, लेकिन रात भर सो न सकी। चिंता और उमड़ती हुई सोच ने उसे सोने ही नहीं दिया। ममता से भरा दिल टीस रहा था। बेटी का मजबूर-सा चेहरा बार-बार उसकी निगाहों के सामने घूम जाता।

ये बेटियाँ ही थीं, जिन्हें पालने-पोसने और पढ़ा-लिखाकर उनके घर विदा करने के लिए उसने पूरी ज़िंदगी लगा दी थी। वह सास, जो तानों से हर पल उसका सीना छलनी करती थी, उसकी ख़िदमतें की थीं। हर बात ख़ामोशी से सुनी थी। बदमिज़ाज शौहर को भुगता था।

वापसी की कोई राह तो पहले भी कभी नहीं थी। मायके से किसी मदद की उम्मीद करना तब भी ग़लत माना जाता था और अब तो दोनों छोटी बहनें भी अपने-अपने घर की हो चुकी थीं। भाई अपनी गृहस्थी में व्यस्त था। माँ-बाप को गुज़रे बरसों बीत चुके थे।

बी.ए. अंतिम वर्ष की परीक्षा होते ही माँ-बाप ने उसकी शादी उससे कम-से-कम पंद्रह वर्ष बड़े नासिर से कर दी थी। नासिर शुरू से ही हद दर्जे का लापरवाह था और इसी आचरण के कारण उसकी शादी में भी देर हुई थी, क्योंकि कोई अपनी लड़की लगभग बेरोज़गार आदमी को देने के लिए तैयार नहीं था। शादी के समय वह कुछ महीनों से एक प्राइवेट नौकरी में लगा हुआ था।

इस तरह कम ख़र्च और कम लेन-देन के साथ नईमा की शादी कर दी गई थी।

अगले छह साल ज़िंदगी बिल्कुल आसान नहीं रही। नासिर की नौकरी उसकी रोज़-रोज़ की लापरवाहियों के कारण लगती और फिर चली जाती। वह बेहद बदमिज़ाज आदमी था। ज़रा-ज़रा-सी बात पर घर में तूफ़ान खड़ा कर देता और जब ज़्यादा भड़कता तो अक्सर नईमा को पीट भी देता।

नईमा समझ चुकी थी कि इस तरह गुज़ारा होना मुश्किल है। उसने जैसे-तैसे टाइपिंग सीखी और उसकी परीक्षा पास की।

इसी बीच दो बेटियों का जन्म हुआ। दूसरी बेटी के समय वह मायके में थी और उसके जन्म के बाद वहीं उसने ऑपरेशन भी करा लिया। बेटियों का होना ही कुछ कम नहीं था। शौहर तो पहले ही बार-बार तलाक़ की धमकी देता रहता था। अब आगे बेटे की उम्मीद भी टूट गई थी, इसलिए सास और शौहर की बेटे के लिए हाय-हाय की कोई हद न थी।

लेकिन क्या हो सकता था?

समय था, जो बस बीत रहा था। और घर में खाने तक के लाले पड़ रहे थे।

तभी ज़िला कार्यालय की निर्वाचन शाखा में दैनिक वेतन पर लिपिकों की आवश्यकता की सूचना मिली। आवेदन करने पर नईमा का चयन हो गया।

नासिर कई महीनों से बेकार बैठा था। भले ही घर में किसी ने उत्साह ज़ाहिर न किया हो, फिर भी यह ख़बर उसके लिए सुकून देने वाली थी। नईमा ने नौकरी ज्वाइन कर ली और उस अल्प वेतन में कम-से-कम घर में भोजन की व्यवस्था होने लगी।

सुबह खाना बनाकर और पूरी तैयारी करके वह बेटियों को सास के हवाले करके घर से निकलती। शाम साढ़े पाँच बजे तक लौटती और आते ही बच्चों को सँभालने और घर के कामों में लग जाती।

सास किसी तरह बच्चों को देखती तो थीं, लेकिन एहसान जताने की कोई सीमा न थी। वह कहतीं—

"अपनी तो क़िस्मत ही ख़राब है। बहुएँ आती हैं आराम देने के लिए, हम तो नौकरों की तरह उनके बच्चे पाल रहे हैं।"

नासिर अपनी हीन भावना को चीख़-चिल्लाकर निकालता। अब उसमें शंकाएँ भी जुड़ गई थीं। वह पूछता—

"इतने सज-सँवरकर किसको दिखाने जाती है?"

घर के कामों से तैयार होने तक की फ़ुर्सत नईमा को वैसे ही नहीं मिलती थी। ऐसे सवालों के बाद साफ़-सुथरे होकर दफ़्तर जाना भी उसके लिए कठिन हो जाता।

तीन महीने काम करते हुए बीत गए थे। उसकी काम के प्रति गंभीरता ने अधिकारियों के सामने उसकी अच्छी छवि बना दी थी। कलेक्ट्रेट में लिपिकों की आवश्यकता हुई तो उसे नियमित कर्मचारी के रूप में रख लिया गया।

थोड़ा प्रयास करने पर एक छोटा-सा सरकारी क्वार्टर भी आवंटित हो गया और यह परिवार मोहल्ले के अपने मकान को किराए पर देकर सरकारी क्वार्टर में रहने लगा।

नईमा का वेतन सास के हाथ में जाता था, क्योंकि बेटियों को सँभालने के लिए यही उनकी पहली शर्त थी और वही घर का ख़र्च चलाती थीं।

दोनों बेटियाँ अब स्कूल जाने लगी थीं। सुबह नईमा उनके टिफ़िन तैयार करके दोनों को तैयार करती और नासिर उन्हें स्कूल छोड़ने तथा दोपहर में वापस लाने जाता।

बेटियों का अधिकांश समय दादी के साथ या अपने पिता के साथ बीतता। इससे दोनों की उन्हीं से गहरी घनिष्ठता बढ़ती गई। नईमा घर में भी व्यस्त रहती थी। उसकी हैसियत घर में काम करने वाले नौकर से ज़्यादा कुछ नहीं थी।

बेटियाँ बचपन से माँ को हुक्म बजाते, डाँट खाते और पिटते देखती रहीं। साथ ही दादी और पिता से उसकी बुराई सुनते हुए बड़ी हुईं।

धीरे-धीरे वे माँ के प्रति इतनी नकारात्मक होती गईं कि जब कभी नासिर नईमा को डाँटता और वह सफ़ाई देने लगती, तब दोनों बेटियाँ पिता की ओर से माँ को चुप रहने के लिए मजबूर कर देतीं और परिवार को समय न देने के लिए उसी को दोषी ठहरातीं।

वक़्त गुज़रता गया।

दादी स्वर्गवासी हो गईं।

युवा हो चुकी दोनों बेटियाँ पूरी तरह अब्बा की बेटियाँ थीं। दादी और पिता द्वारा किया गया मानसिक अनुकूलन ऐसा था कि नौकरी करना या घर से बाहर जाकर काम करना उन्हें बुरा लगता था।

पढ़ी-लिखी और देखने में अच्छी होने के कारण रिश्तों में समस्या नहीं आई। दोनों की अच्छे, नौकरीपेशा लड़कों से शादियाँ हो गईं। इन शादियों में नईमा का जी.पी.एफ. भी काम आया।

समय बीतता गया और वह रिटायर हो गई।

पिछले वर्ष से लीवर की बीमारी ने नासिर को और अधिक चिड़चिड़ा बना दिया था। अब वह थोड़ी-थोड़ी देर में खाने के लिए कुछ नया माँगता। देने पर खाकर उल्टियाँ करता, पायजामा ख़राब कर लेता और मनचाहा खाना न देने पर भयंकर हंगामा कर देता।

नासिर को धुलवाना, नहलाना और दवाइयाँ खिलाना नईमा का रोज़ का काम था।

सबसे मुश्किल तब हो जाती, जब वह सड़क पर निकलकर चिल्लाता और नईमा पर गन्दे इल्ज़ाम लगाता।

इधर कुछ दिनों से वह लगातार धमकी दे रहा था कि वह नईमा को छोड़कर अपनी बेटियों के पास रहने चला जाएगा। नईमा की रूह इस ख़याल से काँप जाती कि बेटियों की बसी-बसाई गृहस्थी में यह आदमी कहीं मुसीबत न खड़ी कर दे।

वह उसे सामान्य रखने की भरसक कोशिश करती, लेकिन वह चाहे जब बिखर जाता।

और अब तो वह वहाँ पहुँच ही गया था।

करवटें बदलते-बदलते सुबह होने को आई, लेकिन चिंता बढ़ती ही जा रही थी।

उसने सोचा—

"सफ़िया बेचारी क्या करेगी? उसके शौहर और बच्चों के सामने उसकी कितनी बेइज़्ज़ती होगी। मैं समझती थी कि बेटियों की शादी के बाद मुश्किल वक़्त ख़त्म हो जाएगा, लेकिन सच यह है कि माँ होना ज़िंदगी भर की परीक्षा है।

नहीं... कुछ भी हो, मैं अपनी बेटियों को परेशान नहीं होने दूँगी।"

नईमा का दिल एक अजीब दहशत से बैठा जा रहा था। सुबह होना मुश्किल हो गया था। अभी अँधेरा ही था कि वह मुँह-हाथ धोकर तैयार हो गई और रौशनी होने का इंतज़ार करने लगी।

समय गुज़र ही नहीं रहा था।

वह चाहती थी कि बेटी के घर तब पहुँचे, जब आमिर दफ़्तर जा चुका हो, ताकि नासिर को रोकने की कोई बात ही न निकले।

वह लगभग दस बजे घर से निकली।

ऑटो में बैठी ही थी कि मोबाइल की घंटी बजी। सफ़िया थी।

"अम्मा, आप जल्दी से आ जाइए। अब्बा ने सब कपड़े गन्दे कर दिए हैं। मुझे समझ में नहीं आ रहा, कैसे क्या करूँ... अम्मा, प्लीज़!"

"मैं रास्ते में हूँ बेटा, बस पहुँचती हूँ। तुम बाथरूम का गीज़र खोलकर रखो।"

उधर का सारा नक़्शा जैसे उसकी निगाहों में था।

ऑटो वाले को किराया देकर वह लगभग भागती हुई घर में घुसी।

आमिर दफ़्तर और बच्चे स्कूल जा चुके थे। सफ़िया घबराई और बौखलाई हुई थी। नासिर के कपड़े ही नहीं, पायजामा और बिस्तर भी उल्टी से गन्दे हो चुके थे।

अच्छा हुआ था कि नासिर के पीछे आते हुए वह छह-सात जोड़ी कपड़े और दवाइयाँ साथ लाई थी और यहाँ छोड़ गई थी।

नईमा ने फुर्ती से नासिर को सहारा दिया और बाथरूम तक ले गई। पानी चलाया तो वह गर्म था। नासिर को कुर्सी पर बैठाया। गुनगुने पानी से नहलाकर साफ़ कपड़े पहनाए और बाहर ले आई।

फिर कल से अब तक के सभी गन्दे कपड़े एक थैले में भरे। चादर बदली और कमरे को बिल्कुल ऐसे साफ़ किया, जैसे कोई मुजरिम अपने जुर्म को छिपाने के लिए हर सबूत मिटा देता है।

इस बीच नासिर बिल्कुल चुपचाप उसे सब करते देखता रहा।

लेकिन जब नईमा ने सफ़िया से ऑटो बुलाने के लिए कहा, तब वह फिर पुराने रूप में लौट आया।

"नहीं, मैं इसके साथ नहीं जाऊँगा। मैं यहीं रहूँगा। इससे कहो, ये भी यहीं रहे।"

नईमा ने उसके सामने हाथ जोड़ दिए।

"तुम जो कहोगे, मैं करूँगी। हम यहाँ नहीं रह सकते। ये हमारा घर नहीं है। बस मेरे साथ चलो... रहम करो।"

ऑटो रिक्शा आ गई थी।

नासिर कुछ देर सोचता रहा। फिर उठने की कोशिश की तो नईमा ने कंधे का सहारा देकर उसे ऑटो में बैठाया और ख़ुद भी उसके साथ बैठ गई।

सफ़िया साफ़ कपड़ों की अटैची और गन्दे कपड़ों का थैला ऑटो में रख चुकी थी।

रिक्शा घर की तरफ़ रवाना हुआ तो नईमा ने इत्मीनान की साँस ली।

उसे लगा, अब उसकी बेटी चैन से जी सकेगी।

लेकिन यह तय था कि उसे ख़ुद अभी माँ होने के और भी ज़्यादा सख़्त इम्तिहान से गुज़रना होगा।


दूर जाती हुई रिक्शा धीरे-धीरे निगाहों से ओझल हो गई और सफ़िया ख़ाली नज़रों से उसी तरफ़ टकटकी लगाए खड़ी रह गई।

अक्टूबर की तेज़ धूप ने जब गर्मी का एहसास कराया, तब उसे होश आया। भारी क़दमों से, जैसे ख़ुद को घसीटती हुई, वह अंदर कमरे में आई।

कमरा साफ़-सुथरा था।

पलंग पर अब्बा नहीं थे।

कैसा सूना-सा एहसास था।

दिल में टीस उठी।

वह पलंग पर बैठ गई। अम्मा ने पलंग पर दूसरी चादर बिछा दी थी। खिड़की से आँगन में तार पर फैली धुली हुई चादर दिखाई दे रही थी। उसी के पास वह कुर्सी भी धूप में धुली रखी थी, जिस पर अब्बा को नहलाया गया था।

बाथरूम का दरवाज़ा खुला था। वह भी धोया जा चुका था।

अनायास उसके मुँह से निकला—

"मेरी प्यारी अम्मा!..."

उसकी निगाहों में बिजली की फुर्ती से अब्बा को नहला-धुलाकर साफ़ कपड़ों में बाहर बैठाती, चादर और बाथरूम धोती, पलंग और कमरा साफ़ करके चादर बिछाती माँ की छवि घूम गई।

और उसे अफ़सोस हुआ कि उस समय वह ख़ुद किंकर्तव्यविमूढ़-सी अपनी उल्टियाँ रोक रही थी।

"वे चले गए... वे दोनों चले गए... मेरे अब्बा!... अम्मा!... मेरी अम्मा!"

अंदर घुमड़ता हुआ लावा जैसे फूट पड़ा।

पिछले दो-तीन घंटों में यह क्या हो गया था?

वह ऐसी कैसे हो सकती थी?

वे उसके माँ-बाप थे।

उसने दोनों हाथों से अपना मुँह ढक लिया और देर तक रोती रही।

दोपहर ढल गई थी। मरे-क़दमों से किचन में जाकर उसने खाना गर्म किया।

स्कूल बस इस सरकारी क्वार्टर के बाहर ही रुकती थी। बस रुकने की आवाज़ आई। बच्चे आ गए थे। कपड़े बदलकर और खा-पीकर वे अपने खिलौनों और किताबों में लग गए।

उसने शाम के लिए खाना बनाया और अनमनी-सी फिर उसी कमरे में लौट आई।

पलंग पर बैठते ही निगाहों के सामने फिर वही चेहरे घूमने लगे।

"अब्बा कितने बूढ़े हो गए हैं... अम्मा ठीक हैं, लेकिन वे अब्बा से छोटी भी तो बहुत हैं... दो साल रिटायर होकर बीत गए... बासठ की होंगी... कितनी मेहनत करती हैं वे अब तक...

हमने उन्हें हमेशा किसी न किसी काम में लगे पाया... घर का सारा काम... फिर दफ़्तर... और हम सब?

जब दादी थीं तो दादी भी... अब्बा और हम दोनों बहनें?

हमें अब तक वही आदत पड़ी है कि जहाँ कोई समस्या हो, उन्हें पुकार लें... उन्हें सौंप दें... चाहे मुश्किल काम हो या आसान... और वे बिना रुके सब कर दें।

लेकिन कब तक?

मैं उन्हें रोक क्यों नहीं सकी?

वे जैसे भी हैं, मेरे अपने हैं।

आमिर...

हाँ, मैं बहुत डरती हूँ आमिर से। बचपन से अब्बा का डर देखा है। अम्मा अपने माँ-बाप और भाई-बहनों तक से कहाँ मिल पाती थीं। मैंने जब-तब अब्बा से अम्मा को छोड़ देने की धमकियाँ सुनी हैं।

आमिर अगर मुझे निकाल दें तो मैं कहाँ जाऊँगी?"

वह गुमसुम बैठी रही। उसने खाना नहीं खाया।

दिन ढल गया।

आमिर आ गए थे। उनके साथ कोई और भी था। ड्राइंग रूम से बातचीत की आवाज़ आई तो वह घबराकर खड़ी हो गई।

आमिर दूसरे व्यक्ति को ड्राइंग रूम में बैठाकर इसी कमरे में आए। कमरा ख़ाली देखकर हैरान हो गए।

"अब्बा कहाँ हैं?"

"वो... वो अम्मी के साथ चले गए," वह हकलाकर बोली।

"क्या? और तुमने जाने दिया? ग़ज़ब करती हो तुम भी!"

वह चुप खड़ी रही।

"सफ़िया, मैं अब्बा को सँभालने के लिए मेल नर्स साथ लाया हूँ। अम्मी उन्हें वहाँ कैसे सँभाल सकेंगी?"

उसने नज़रें उठाकर देखा।

अब क्या कहे?

कैसे कहे कि उसे तो आमिर का ही डर था और उसकी नासमझी ने उसे अपने माँ-बाप से दूर कर दिया?

बस उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

आमिर ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"रोओ मत। हम वहाँ चलेंगे। अब्बा इतने बीमार थे तो तुम्हें और अम्मी को मुझे बताना चाहिए था। अभी फ़ोन करो।"

उसने फ़ोन लगाया।

"अम्मा!"

आगे के लफ़्ज़ गले में फँसकर रह गए।

"हाँ सफ़िया, बोलो बेटा। क्या हुआ? क्या बात है? बोलो।"

उधर से घबराई हुई आवाज़ थी।

"अम्मा, मैं और आमिर अभी उधर आ रहे हैं।"

"इस वक़्त? क्यों? क्या हुआ?"

"अम्मा, अब्बा बीमार हैं न। आप लोगों ने खाना खाया?"

"हाँ भई, वहाँ से आकर बनाया भी, खाया भी। तुम्हारे अब्बा तो दोपहर बाद से खाना और दवा खाकर सो रहे हैं। अब उठाती हूँ। यहाँ तो सब ठीक है।"

"अच्छा अम्मा, हम आते हैं।"




नईमा के रिटायरमेंट के बाद सरकारी क्वार्टर खाली करके नासिर और वह मोहल्ले के अपने मकान में शिफ़्ट हो गए थे।

यह नासिर का पुश्तैनी मकान था, जिसे आड़े वक़्त में किराए पर दे दिया गया था और रिटायर होने से पहले ख़ाली करा लिया गया था। इसमें चार बड़े कमरे, एक आँगन और दो बरामदे थे। दोनों मियाँ-बीवी के लिए एक कमरा ही काफ़ी था।

थोड़ी ही देर में सफ़िया और आमिर दोनों बच्चों के साथ नईमा और नासिर के पास बैठे थे।

बच्चे नाना और नानी से बातें करते रहे।

आमिर ने कहा—

"हम आप दोनों को लेने आए हैं। आप दोनों वहीं चलिए और साथ ही रहिए।"

"बेटा, हमें यहाँ हर तरह की सहूलत है। मोहल्ले के लोग बहुत अच्छे हैं। हर चीज़ घर पर ही आ जाती है। दिन भर कोई न कोई आता-जाता रहता है।"

"अम्मा, वो तो ठीक है, लेकिन अब्बा को आप अकेले कैसे सँभाल सकती हैं? उनके लिए तो मदद चाहिए होती है न।"

"नहीं बेटा। ये जो पास में घर है न, ज़रूरत के वक़्त उनका बेटा एक फ़ोन पर या खिड़की से पुकारने पर भागा हुआ आ जाता है और सब करा देता है। मैं उसके बच्चों को पढ़ाती हूँ। उनके अच्छे-बुरे में उनके साथ होती हूँ। अब सारे दिन फ़ालतू हूँ, मेरा भी दिल लगा रहता है।

तुम्हारे अब्बा के पास भी कोई न कोई आता-जाता रहता है। यहाँ इनके बचपन के दोस्त भी हैं।

वो सामने वाला कमरा देखा है? उसमें मैंने झूलाघर खोल रखा है। चार बाइयाँ रखी हैं। काम पर जाने वाली महिलाएँ मेरे भरोसे सुबह बच्चों को यहाँ छोड़ जाती हैं और शाम को ले जाती हैं।

इसे छोड़कर मैं तो कहीं जा ही नहीं सकती। ये बाइयाँ मेरे यहाँ के कपड़े-वपड़े धो देती हैं, काम भी कर देती हैं।"

दरअसल वे जब भी यहाँ आए, शाम को ही आए थे। तब तक बाइयाँ और बच्चे जा चुके होते थे। इसलिए उन्हें झूलाघर के बारे में मालूम ही नहीं था।

आमिर और सफ़िया एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।

सफ़िया को अपनी अम्मा पर गर्व हो आया।

दादी और अब्बा हमेशा यही कहते रहे थे कि अम्मा का दिल घर के कामों में कम और दूसरों के फ़ालतू काम करने में ज़्यादा लगता था।

उसने सोचा—

"क्या ऐसे काम सचमुच फ़ालतू होते हैं?

बिल्कुल नहीं।

ये तो उस समाज की ज़रूरत होते हैं, जिसमें हम रहते हैं और जिनके फ़ायदे किसी न किसी रूप में हम तक भी लौटते हैं।"

नईमा चाय बनाने के लिए उठी तो सफ़िया पीछे-पीछे रसोई में चली आई। सेब काटते और कप-प्लेट ट्रे में रखते हुए उसने पूछा—

"ये झूलाघर आपने कब शुरू किया?"

"मैंने कहाँ शुरू किया? एक साल पहले मोहल्ले में दिलशाद की बहू की नौकरी लगी। बच्चा छोटा था, तो मैंने कह दिया कि बाई के साथ यहाँ छोड़ दो, मैं नज़र रख लूँगी। बस, एक से दो, दो से तीन... अब तो बीस बच्चे हैं।"

"वाह! ये तो कमाल कर दिया आपने।"

"कमाल कुछ नहीं। बाइयाँ सँभालती हैं, मैं तो बस देखती हूँ। पहले बस दरियाँ बिछी थीं। अभी कुछ झूले और खिलौने भी खरीद लिए हैं। जो कमरा बंद था, वहीं रखे हैं। वहीं बच्चे सोते हैं। किराए पर देने से यह काम करना सही लगा। फ़ीस भी आ जाती है।"

"अम्मा, आज आमिर ने अब्बा की वहाँ देखभाल का पूरा इंतज़ाम किया। मुझे वही यहाँ लेकर आए थे। मैं उनसे बहुत डरती थी, लेकिन अम्मा... आमिर बहुत अच्छे हैं। अब्बा जैसे नहीं हैं।"

नईमा मुस्कराई।

"बेटा, सब लोगों की अपनी-अपनी फ़ितरत होती है, जो कभी नहीं बदलती। कोई भी दो लोग एक जैसे नहीं होते। फिर हालात भी तो होते हैं। तुम हमारी बिल्कुल फ़िक्र मत करो। मैं सब सँभालती आई हूँ, आगे भी सँभाल लूँगी।"

दोनों माँ-बेटी चाय-नाश्ता लेकर वापस आ गईं।

बातों-बातों में सफ़िया ने अब्बा से पूछा—

"अब्बा, आप मेरे पास रहेंगे न?"

"नहीं, मैं अपने घर ठीक हूँ," नासिर ने लेटे हुए ही कहा, "लेकिन अपनी माँ से कहो मुझे खाने के लिए ढंग की चीज़ें दिया करे। अब इतनी देर से तुम लोग आए हो, कम-से-कम अनवर को फ़ोन करके समोसे और गुलाब जामुन ही मँगा लेती। लेकिन नहीं, मैं जो खा लूँगा, सदा की दुश्मन है मेरी।"

नासिर ने नईमा की शिकायत की।

"अब्बा, हम खाना खाकर आए हैं और अम्मा ने सेब और नाशपाती हम सबको खिलाए तो हैं, चाय भी पिलाई है। आप ऐसा किया कीजिए कि जिस चीज़ का दिल चाहे, हमें फ़ोन कर दिया कीजिए। हम ले आया करेंगे।"

वापसी में लौटते हुए आमिर और सफ़िया ने तय किया कि वे रोज़ फ़ोन करेंगे और जल्दी-जल्दी मिलने भी आया करेंगे।


दिन महीने बने और साल गुज़र गए।

सफ़िया और आमिर आते-जाते रहे। नईमा और नासिर को समय-समय पर अपने घर भी ले जाते रहे। इलाज में भी कोई कमी नहीं रखी।

इसके बावजूद नासिर की हालत नहीं सुधरी। न उसका मिज़ाज बदला।

आख़िर नासिर का दो साल बाद इंतिक़ाल हो गया।

बड़ी बेटी और दामाद आए हुए थे और आख़िरी समय तक उसके साथ रहे।

नईमा अब उसी घर में रहती है।

अब वहाँ केवल झूलाघर ही नहीं, एक प्ले स्कूल भी है। एक पंजीकृत संस्था बनाकर उसने अब कई दूसरे इलाक़ों में भी झूलाघर खोल दिए हैं, ताकि कामकाजी महिलाएँ अपने बच्चों को भरोसे के साथ वहाँ छोड़कर काम पर जा सकें।

दोनों बेटियों को ही नहीं, उनके बच्चों को भी नईमा पर गर्व है।



Writte By: Shameem Zahra

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